Gadkari, MSMEs complain of poor disbursal under 59-minute loan scheme

NEW DELHI: Micro, small and medium enterprises (MSME) minister Nitin Gadkari and small businesses on Tuesday complained about the 59-minute loan scheme being slow in disbursing loan, while asking FM Nirmala Sitharaman to ensure that their dues from the government are cleared expeditiously.

Gadkari flagged both the concerns during a meeting convened by FM as part of a series of consultations in what is seen as a precursor to a set of steps to rev up economy.

While the scheme was launched by PM Narendra Modi last year, businesses have been complaining that the portal issues the sanction letter quickly but banks are slow in disbursing loans. During a meeting with RBI governor Shaktikanta Das earlier this year, industry representatives had estimated that only around 10% of the sanctioned amount was getting disbursed and had suggested that the money should be released within two weeks.

They raised the concern before the FM on Tuesday and expect that the government fix the major problem with the high-profile scheme.

They also complained about the poor disbursal of loans despite a credit guarantee fund being set up to ensure that MSMEs did not suffer due to lack of loan flow.

In response to their other major worry related to delayed payments even from government agencies, Sitharaman told the gathering that the administration was estimating the amount of dues under two heads — disputed and undisputed — and once the exercise is completed, the release of the undisputed amount would be expedited.

Gadkari also called for a need for import substitution and asked industry representatives to identify products that could be produced locally, instead of being shipped into the country.

When industry representatives pointed to easier rules being put in place by some states, Sitharaman suggested that the businesses could provide a list of some of the steps taken in recent months and the Centre could approach other chief ministers to move ahead with reforms.

She also asked industry representatives to send their response to the U K Sinha committee over the next three-four days, indicating that the recommendations would be implemented quickly.

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1 thought on “Gadkari, MSMEs complain of poor disbursal under 59-minute loan scheme”

  1. *देश मे अर्थव्यवस्था के विकास के साथ साथ टैक्स कलेक्शन के आकड़ो में प्रोजेक्शन में मुख्य भूल के कारण ।*

    (1) बैंको का जो पिछले 3 से 4 वर्षो में करीब ₹9 से 10 लाख करोड़ का NPA रेकॉर्ड हुआ है।
    अगर समय पर इस loan की रिस्ट्रक्चरिंग कर दी जाती तो हमे आज इस कठिन दौर से नही गुजरना पड़ता ।
    सरकारों को टैक्स कलेक्शन व बैंक loan को एक साथ देखना चाहिये । बिना लोन बाटे लोगो को purchasing पावर नहीं बढ़ाया जा सकती ।

    जब पुरचज़िंग पावर बढ़ती है तो मानव संसाधनों का आउट पुट भी बढ़ता है व रोजगार व स्वरोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न होते है।
    (2) ग्रोथ के कैलकुलेट करने में सरकारी आकड़ो में बैंको के NPA आंकड़े को तो कंसीडर किया गया परंतु ट्रेड व इंडस्ट्री का जो क्लीन क्रेडिट के रूप में करीब ₹10 से 15 लाख करोड़ रुपये डूबा / रुका/ फसा हुआ है उसका अर्थव्यवस्था व टैक्स कलेक्शन पर क्या नेगेटिव प्रभाव पड़ रहा है इसकी कही पर गणना नही की गई व सरकार के पास इस तरह ट्रेड व इंडस्ट्री के फसे / रुके / डूबे फंड्स को रिकॉर्ड करने का कोई सर्वमान्य मैकेनिज्म भी नही है ।
    सरकार को इस रुके धन की जानकारी इकठ्ठा करने के लिये एक वेब पोर्टल तत्काल बनाना चाहिये ताकि ग्रोथ के आकड़ो को प्रोजेक्ट करने में पुनः गलती न हो।
    (3) विभिन टैक्स विभागों में बैक डेट से अधिकाश उद्योगों , कंपनियो , इंडिविसुअल के विरुद्ध 6 से 7 वर्षो पूर्व को टैक्स डिमांड निकली गई जो कि तत्कालीन सरकारों की सन 1991 के देश मे आर्थिक उदारीकरण की सरकार व सभी सरकारी एजेंसियो की मूक सहमति का हिस्सा थी।

    अतः बगैर इन सभी मामलों में लिनीयट सोच हम व्यापारिक माहौल को अच्छा नही कर सकते अभी भी समय है तत्काल इस पर गंभीरता से विचार कर बैंको का करीब ₹ 8 से 9 लाख करोड़ आगामी 2 से 3 वर्षो में नया NPA होने से बचावे ।
    वार्ना हमारी अर्थव्यवस्था का भयंकर मंदी के कगार पर आना व ध्वस्त होना निश्चित है ।

    व देश मे बेरोजगारी भी चरम पर होगी । यह बेरोजगारी भविष्य में देश मे कानून व व्यवस्था के लिये भी समस्या खड़ी हो सकती है।

    (4) कोल् ब्लॉक व आयरन ओर खनन के कैप्टिव उपयोग के लिये दिए गए पट्टो को रातो रात कैंसिल करने के एक मात्र कारण था कि Power व स्टील सेक्टर में बैंको का सबसे अधिक NPA दर्ज हुवा । यह सरकार की सबसे बडी भूल थी साथ ही इस कारण से देश मे हुई कोयले व आयरन ओर को कमी को देश की खदानों से प्रोडक्शन बड़ाने की बजाए Import की अनुमति दी गई इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पर बहुत बड़ा दबाव पड़ा । और Rs v/s $ के एक्सचेंज रेट गिरावट दर्ज की गई।
    (5) पर्यावरण ,टाउन एंड कंट्री प्लानिंग ,लैंड डायवर्सन के नाम देश मे भ्रस्टाचार चरम सीमा है । आज भी इन अनुमतियों के लिये 1.5 से 3 वर्ष का समय लग जाता है जिसके कारण अधिकांश उधोय लगने /उत्पादन के पूर्व ही बीमार हो जाते है।

    अतः इस समस्या का तत्काल निदान निकलने की जरूरत है ।
    व सिंगल विंडोज क्लीयरेंस के तहत अधिकतम 45 दिनों के समय सीमा के अंदर सपुर्ण विभागों की ऑनलाइन NOC ही एक मात्र विकल्प है जससे देश मे कारोबार के माहौल को पुनः स्थापित किया जा सकता है।
    (6) 7 th Pay कमिशन को सिफारिशों देश के सरकारी खजाने पर सबसे बडा बोझ बनकर उभरी है।
    सरकारी विभागों के अधिकारियों में कर्मचारियों की तनख्वाह तो काफी बढ़ा दी गई उसके अनुरुप उनकी जवाब देहि व कार्य शैली में कोई बदलाव देखने को नही मिला।

    सरकारी अधिकारियों को भूमिका हमेशा एक फैसिलिटेटर को होनी चाहिये चाहिये परंतु ठीक इसके विपरीत सभी अधिकारीयो की सोच किस तरह से ट्रेड व इंडस्ट्री की टैक्टिकल गलती व त्रुटि निकल कर उन्हें आर्थिक नुकसान पहुचाने के साथ साथ दंडित करने का भय दिखा कर कैसे रिस्वत खोरी व भ्रस्टाचार को बढ़ावा दिया जावे बन कर रह गई ।
    जिसकी परिणति के परिणाम स्वरूप वर्तमान में व्यापारियों ,अधिकारियों बाबुओं,व राज नेताओ के निजी स्वार्थपूर्ति के गठजोड़ के रूप में दिखाई पड़ रहा है।

    आपश्री की सार्थक प्रतिक्रिया, सुझाव व विचार आमंत्रित है

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